ज़िंदगी के बहुत करीब है ‘जावेद अख्तर’ की ये नज़्म
दोस्तों,जावेद अख्तर| भारतीय साहित्य का वो नाम, जो हर मुद्दे पर अपनी राय बेबाकी से रखता है| चाहे वो नज़्म हो, फ़िल्मी गीत हो या राजनीति| उनकी नज़्मे और उनके लिखे हुए गाने ज़िंदगी के बहुत करीब होते है| जिसमे समाज के हर वर्ग के लोग अपनी कहानी ढूंढ सकते है| इसिलए फिल्म “कभी-कभी” से लेकर फिल्म “गली बॉय” तक उनके लिखे गाने हर वर्ग को पसंद आतें है| तो आज,हम आपके सामने जो पेश करने जा रहा है, वो जावेद साहब की एक मशहूर नज़्म है|
मेरे मुखालिफ़ ने चाल चल दी है
और अब मेरी चाल के इंतेज़ार में है
मगर मैं कब से
सफेद खानो, सियाह खानो में रखे
काले सफेद मोहरों को देखता हूँ,
मैं सोचता हूँ…
यह मोहरे क्या हैं?
अगर मैं समझूँ यह जो मोहरे हैं
सिर्फ़ लकड़ी के हैं खिलोने
तो जीतना क्या, हारना क्या
ना ये ज़रूरी, ना वो अहम है
अगर खुशी है ना जीतने की, ना हारने का ही कोई गम है,
तो खेल क्या है?
मैं सोचता हूँ जो खेलना है
तो अपने दिल में यक़ीन कर लूँ
ये मोहरे सचमुच हैं बादशाह, वज़ीर, प्यादे
और इनके आगे है दुश्मनो की वो फौज
रखती है जो मुझको तबाह करने के
सारे मंसूबे, सब इरादे
अगर मैं ऐसा मान भी लूँ, तो सोचता हूँ
यह खेल कब है?
यह जंग है, मुझ को जीतना है
यह जंग है जिस में सब है जायज़
कोई यह कहता है जैसे मुझ से
यह जंग भी है, यह खेल भी है…
यह जंग है पर खिलाड़ियों की
यह खेल है जंग की तरह का
मैं सोचता हूँ जो खेल है
इसमें इस तरह का उसूल क्यों है
की कोई मोहरा रहे की जाए
मगर जो है बादशाह उस पर
कभी कोई आँच भी ना आए
वज़ीर ही को है बस इजाज़त
की जिस तरफ भी वो जाना चाहे.
मैं सोचता हूँ जो खेल है
इसमे इस तरह का उसूल क्यूँ है
की प्यादा जो अपने घर से निकले, पलट के वापस ना जाने पाए
मैं सोचता हूँ…
अगर यही उसूल है तो फिर उसूल क्या है?
अगर यही खेल है तो फिर यह खेल क्या है?
मैं इन सवालों से जाने कब से उलझ रहा हूँ
मेरे मुखालिफ़ ने चाल चल दी है
और अब मेरी चाल के इंतेज़ार में है
– जावेद अख़्तर

Writer, Storyteller, Dreamer



